श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 17

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 2 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
तद्बुद्धयः
जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है
तदात्मानः
जिनका चित्त उसमें लगा है
तन्निष्ठाः
जिनकी निष्ठा उसमें है
तत्परायणाः
जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं
गच्छन्ति
जाते हैं
अपुनरावृत्तिम्
पुनर्जन्म रहित स्थान
ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः
ज्ञान से पापों से रहित हुए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है, जिनका चित्त उसी में है, जिनकी निष्ठा उसी में है और जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान द्वारा सब पापों से रहित होकर पुनर्जन्म रहित पद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इस श्लोक में भक्ति और समर्पण के मार्ग का वर्णन है। जो पूरी तरह से परमात्मा में स्थित हो जाते हैं, उनके सभी पाप (संस्कार) ज्ञान से धुल जाते हैं और वे मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिनकी बुद्धि, मन, निष्ठा और परम लक्ष्य केवल परमात्मा में हैं, वे ज्ञान से सभी पापों से मुक्त होकर उस परम धाम को प्राप्त होते हैं, जहाँ से लौटना नहीं होता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 17/29 59% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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