कर्म षटक (अध्याय १-६) अध्याय ६ · कुल ४७ श्लोक 4 मिनट अध्ययन

ध्यान योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ६ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग का वर्णन करते हैं। वह आत्म-संयम, मन को वश में करने और ध्यान की विधि बताते हैं। यह अध्याय योगी के जीवन और उसके परम लक्ष्य का विस्तार से वर्णन करता है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ६ (ध्यान योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग का वर्णन करते हैं। वह आत्म-संयम, मन को वश में करने और ध्यान की विधि बताते हैं। यह अध्याय योगी के जीवन और उसके परम लक्ष्य का विस्तार से वर्णन करता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / २)

श्लोक १ - २५
अध्याय ६ · श्लोक १

श्री भगवानुवाच । अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १॥

हिंदी अर्थ

श्री भगवान् बोले: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्यकर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, केवल अग्नि का त्याग करने वाला या क्रियाओं का त्याग करने वाला नहीं।

अध्याय ६ · श्लोक २

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २॥

हिंदी अर्थ

हे पाण्डुपुत्र! जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसे तू योग समझ। क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं हो सकता।

अध्याय ६ · श्लोक ३

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३॥

हिंदी अर्थ

योगारूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म ही साधन कहा जाता है और योगारूढ़ (सिद्ध) के लिए शम (सब कर्मों से उपराम हो जाना) ही साधन कहा जाता है।

अध्याय ६ · श्लोक ४

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४॥

हिंदी अर्थ

जब मनुष्य इन्द्रिय-विषयों में और कर्मों में आसक्त नहीं होता और सब संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहा जाता है।

अध्याय ६ · श्लोक ५

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५॥

हिंदी अर्थ

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए और अपने को अधोगति में नहीं डालना चाहिए। क्योंकि यह मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु है।

अध्याय ६ · श्लोक ६

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६॥

हिंदी अर्थ

जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए वह मन सबसे अच्छा मित्र है; और जिसने मन को नहीं जीता है, उसके लिए वही मन शत्रु के समान आचरण करता है।

अध्याय ६ · श्लोक ७

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥

हिंदी अर्थ

जिसने मन को जीत लिया है और जो शान्त है, उसका परमात्मा में सम्यक् रूप से स्थित हो जाता है, वह शीत-उष्ण, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में भी समान रहता है।

अध्याय ६ · श्लोक ८

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८॥

हिंदी अर्थ

जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला, कूटस्थ (अपरिवर्तनीय), जितेन्द्रिय और मिट्टी, पत्थर तथा सोने को समान देखने वाला है, वह योगी युक्त (समाधिस्थ) कहा जाता है।

अध्याय ६ · श्लोक ९

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९॥

हिंदी अर्थ

जो हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में समान भाव रखता है, वह (योगियों में) अधिक श्रेष्ठ है।

अध्याय ६ · श्लोक १०

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १०॥

हिंदी अर्थ

योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान में रहता हुआ निरन्तर अपने चित्त को योग में लगाए। वह अकेला, मन और शरीर को वश में किए हुए, आशारहित और संग्रहरहित हो।

अध्याय ६ · श्लोक ११

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११॥

हिंदी अर्थ

किसी पवित्र स्थान में अपने लिए एक स्थिर आसन स्थापित करे, न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा हो।

अध्याय ६ · श्लोक १२

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२॥

हिंदी अर्थ

वहाँ आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करके, आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

अध्याय ६ · श्लोक १३

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३॥

हिंदी अर्थ

शरीर, सिर और गर्दन को सीधा एवं स्थिर रखते हुए, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए, इधर-उधर न देखता हुआ।

अध्याय ६ · श्लोक १४

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४॥

हिंदी अर्थ

शान्त चित्त, भयरहित, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थिर, मन को वश में करके, मुझमें चित्त लगाकर और मुझको परम लक्ष्य मानकर बैठे।

अध्याय ६ · श्लोक १५

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥

हिंदी अर्थ

इस प्रकार सदा अपने मन को योग में लगाने वाला, नियत मन वाला योगी, मुझमें स्थित परम निर्वाण रूप शान्ति को प्राप्त होता है।

अध्याय ६ · श्लोक १६

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! न तो अधिक खाने वाले का योग सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; न अधिक सोने वाले का और न अधिक जागने वाले का।

अध्याय ६ · श्लोक १७

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७॥

हिंदी अर्थ

जो भोजन-विहार में संयमी है, कर्मों में संयत है, सोने-जागने में संयमी है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।

अध्याय ६ · श्लोक १८

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८॥

हिंदी अर्थ

जब अच्छी तरह नियंत्रित चित्त अपने स्वरूप में ही स्थित हो जाता है और सब भोगों की इच्छाओं से रहित हो जाता है, तब वह युक्त (योगी) कहा जाता है।

अध्याय ६ · श्लोक १९

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९॥

हिंदी अर्थ

जैसे वायुरहित स्थान में रखा हुआ दीपक नहीं चलायमान होता, ऐसी उपमा आत्मयोग में लगे हुए योगी के नियंत्रित चित्त के लिए कही गई है।

अध्याय ६ · श्लोक २०

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २०॥

हिंदी अर्थ

जब योग के अभ्यास से निरुद्ध किया हुआ चित्त विरत हो जाता है, और जब आत्मा द्वारा आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है।

अध्याय ६ · श्लोक २१

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१॥

हिंदी अर्थ

जिस परम सुख को वह बुद्धि से ग्रहण करने योग्य और इन्द्रियातीत समझता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता।

अध्याय ६ · श्लोक २२

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२॥

हिंदी अर्थ

जिसे पाकर वह अन्य किसी लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।

अध्याय ६ · श्लोक २३

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३॥

हिंदी अर्थ

दुःख के संयोग से वियोग (छुटकारा) जो है, वही योग के नाम से जाना जाता है। उस योग का अभ्यास निश्चय के साथ और अनिर्विण्ण चित्त से (बिना खीझे) करना चाहिए।

अध्याय ६ · श्लोक २४

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४॥

हिंदी अर्थ

संकल्पों से उत्पन्न सब कामनाओं का पूर्णतः त्याग करके और सब ओर से इन्द्रिय-समूह को मन के द्वारा अच्छी तरह नियंत्रित करके।

अध्याय ६ · श्लोक २५

शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५॥

हिंदी अर्थ

धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थिर करके किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
ध्यान योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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