श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 10

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 108 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
योगी
योगी
युञ्जीत
योग में लगाए
सततम्
निरन्तर
आत्मानम्
अपने आपको
रहसि
एकान्त में
स्थितः
स्थित हुआ
एकाकी
अकेला
यतचित्तात्मा
चित्त और शरीर को वश में किए हुए
निराशीः
आशारहित
अपरिग्रहः
संग्रह रहित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान में रहता हुआ निरन्तर अपने चित्त को योग में लगाए। वह अकेला, मन और शरीर को वश में किए हुए, आशारहित और संग्रहरहित हो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ध्यान के लिए आवश्यक शर्तें: एकान्त, एकाकीपन, चित्त और इन्द्रियों पर नियंत्रण, आशा और परिग्रह का त्याग।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

योगी को निरन्तर अपने मन को योग में लगाना चाहिए, एकान्त में रहकर, अकेला, मन और शरीर को वश में करके, आशा और संग्रह से मुक्त होकर।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ध्यान के लिए बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की तैयारी आवश्यक है – एकान्त स्थान, मन का निग्रह, और सभी इच्छाओं और संग्रह का त्याग।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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श्लोक 10/47 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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