श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 11

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
शुचौ
पवित्र
देशे
स्थान में
प्रतिष्ठाप्य
स्थापित करके
स्थिरम्
स्थिर
आसनम्
आसन
आत्मनः
अपने लिए
न
नहीं
अत्युच्छ्रितम्
बहुत ऊँचा
न
नहीं
अतिनीचम्
बहुत नीचा
चैल-अजिन-कुशोत्तरम्
वस्त्र, मृगचर्म और कुश के आसनों से युक्त (या उनसे बना हुआ)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

किसी पवित्र स्थान में अपने लिए एक स्थिर आसन स्थापित करे, न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा हो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ध्यान के लिए आसन की विधि: पवित्र स्थान, स्थिर आसन, न ऊँचा न नीचा, तीन परतें (कुश, चर्म, वस्त्र)।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

एक पवित्र स्थान पर, न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा, स्थिर आसन बिछाए, जिसके ऊपर क्रम से कुश, मृगचर्म और वस्त्र बिछे हों।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ध्यान के लिए शारीरिक सुविधा भी आवश्यक है। आसन ऐसा हो जो स्थिर हो और शरीर को असुविधा न हो। परतें भूमि के स्पर्श से बचाने और ऊर्जा संरक्षण के लिए हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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श्लोक 11/47 23% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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