मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदसुहृत्
हितैषी
मित्र
मित्र
अरि
शत्रु
उदासीन
तटस्थ
मध्यस्थ
मध्यस्थ
द्वेष्य
द्वेष करने योग्य
बन्धुषु
बन्धुओं में
साधुषु
सज्जनों में
अपि
भी
च
और
पापेषु
पापियों में
समबुद्धिः
समान बुद्धि वाला
विशिष्यते
अधिक श्रेष्ठ है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में समान भाव रखता है, वह (योगियों में) अधिक श्रेष्ठ है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ योगी की समदृष्टि को और भी व्यापक बताया गया है – सभी प्रकार के लोगों (मित्र, शत्रु, सज्जन, दुर्जन) के प्रति समान भाव रखने वाला योगी विशेष रूप से श्रेष्ठ है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो व्यक्ति हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में समान बुद्धि रखता है, वह सबसे श्रेष्ठ है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग का चरम लक्ष्य है – सभी प्राणियों में समान भाव देखना, चाहे वे कैसे भी हों। यही वास्तविक समत्व है।