श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 9

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 105 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
सुहृत्
हितैषी
मित्र
मित्र
अरि
शत्रु
उदासीन
तटस्थ
मध्यस्थ
मध्यस्थ
द्वेष्य
द्वेष करने योग्य
बन्धुषु
बन्धुओं में
साधुषु
सज्जनों में
अपि
भी
च
और
पापेषु
पापियों में
समबुद्धिः
समान बुद्धि वाला
विशिष्यते
अधिक श्रेष्ठ है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में समान भाव रखता है, वह (योगियों में) अधिक श्रेष्ठ है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ योगी की समदृष्टि को और भी व्यापक बताया गया है – सभी प्रकार के लोगों (मित्र, शत्रु, सज्जन, दुर्जन) के प्रति समान भाव रखने वाला योगी विशेष रूप से श्रेष्ठ है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो व्यक्ति हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में समान बुद्धि रखता है, वह सबसे श्रेष्ठ है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग का चरम लक्ष्य है – सभी प्राणियों में समान भाव देखना, चाहे वे कैसे भी हों। यही वास्तविक समत्व है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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श्लोक 9/47 19% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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