मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा
ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला
कूटस्थः
सबसे ऊपर स्थित
विजितेन्द्रियः
जीती हुई इन्द्रियों वाला
युक्तः
योगी
इति
इस प्रकार
उच्यते
कहा जाता है
योगी
योगी
समलोष्टाश्मकाञ्चनः
मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखने वाला।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला, कूटस्थ (अपरिवर्तनीय), जितेन्द्रिय और मिट्टी, पत्थर तथा सोने को समान देखने वाला है, वह योगी युक्त (समाधिस्थ) कहा जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ योगी के उच्चतम लक्षण बताए गए हैं: ज्ञान-विज्ञान से संतुष्ट, स्थिर, जितेन्द्रिय, और सब वस्तुओं में समभाव रखने वाला।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो ज्ञान और विज्ञान (साक्षात्कार) से तृप्त है, स्थिर है, इन्द्रियों को जीत चुका है, तथा मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखता है, वह योगी युक्त (समाधिस्थ) कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सच्चा योगी भौतिक वस्तुओं के मूल्य में अंतर नहीं देखता। वह सबमें एक ही परमात्मा को देखता है।