मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदयम्
जिसको
लब्ध्वा
प्राप्त करके
च
और
अपरम्
दूसरा
लाभम्
लाभ
मन्यते
मानता है
न
नहीं
अधिकम्
अधिक
ततः
उससे
यस्मिन्
जिसमें
स्थितः
स्थित हुआ
न
नहीं
दुःखेन
दुःख के द्वारा
गुरुणा
बड़े से बड़े
अपि
भी
विचाल्यते
विचलित किया जाता।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिसे पाकर वह अन्य किसी लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योग की प्राप्ति सर्वश्रेष्ठ लाभ है। इसमें स्थित व्यक्ति किसी भी दुःख से विचलित नहीं होता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिसे प्राप्त करके मनुष्य किसी अन्य लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग की सिद्धि ही सर्वोच्च उपलब्धि है। यह आत्मिक दृढ़ता प्रदान करती है जो सभी दुःखों से परे है।