श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 22

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 116 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
यम्
जिसको
लब्ध्वा
प्राप्त करके
च
और
अपरम्
दूसरा
लाभम्
लाभ
मन्यते
मानता है
न
नहीं
अधिकम्
अधिक
ततः
उससे
यस्मिन्
जिसमें
स्थितः
स्थित हुआ
न
नहीं
दुःखेन
दुःख के द्वारा
गुरुणा
बड़े से बड़े
अपि
भी
विचाल्यते
विचलित किया जाता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिसे पाकर वह अन्य किसी लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योग की प्राप्ति सर्वश्रेष्ठ लाभ है। इसमें स्थित व्यक्ति किसी भी दुःख से विचलित नहीं होता।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिसे प्राप्त करके मनुष्य किसी अन्य लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग की सिद्धि ही सर्वोच्च उपलब्धि है। यह आत्मिक दृढ़ता प्रदान करती है जो सभी दुःखों से परे है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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श्लोक 22/47 47% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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