मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदसुखम्
सुख
आत्यन्तिकम्
परम
यत्
जो
तत्
वह
बुद्धिग्राह्यम्
बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य
अतीन्द्रियम्
इन्द्रियों से परे
वेत्ति
जानता है
यत्र
जहाँ
न
नहीं
च
और
एव
ही
अयम्
यह
स्थितः
स्थित हुआ
चलति
चलायमान होता
तत्त्वतः
तत्त्व से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिस परम सुख को वह बुद्धि से ग्रहण करने योग्य और इन्द्रियातीत समझता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योग में प्राप्त होने वाला सुख परम, बुद्धिग्राह्य और अतीन्द्रिय है। उसमें स्थित होने पर तत्त्व से च्युति नहीं होती।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
वह परम सुख जो बुद्धि द्वारा ग्रहण किया जाता है और इन्द्रियों से परे है, जिसमें स्थित होकर योगी तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग का सुख इन्द्रिय भोगों से परे है। यह बुद्धि का विषय है और एक बार स्थित होने पर स्थायी है।