मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदयत्र
जहाँ
उपरमते
विरत हो जाता है
चित्तम्
चित्त
निरुद्धम्
निरुद्ध
योगसेवया
योग के अभ्यास से
यत्र
जहाँ
च
और
एव
ही
आत्मना
स्वयं के द्वारा
आत्मानम्
आत्मा को
पश्यन्
देखता हुआ
आत्मनि
आत्मा में
तुष्यति
संतुष्ट होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जब योग के अभ्यास से निरुद्ध किया हुआ चित्त विरत हो जाता है, और जब आत्मा द्वारा आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योग की अवस्था का वर्णन: चित्त का निरुद्ध हो जाना, और आत्म-साक्षात्कार से आत्मा में ही संतुष्ट होना।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जब योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त विराम को प्राप्त होता है, और जब आत्मा द्वारा आत्मा को देखता हुआ वह आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग की चरम अवस्था में साधक को बाहरी वस्तुओं से संतुष्टि नहीं, बल्कि आत्मा में ही परम संतोष मिलता है।