श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 19

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यथा
जैसे
दीपः
दीपक
निवातस्थः
वायुरहित स्थान में स्थित
न
नहीं
इङ्गते
चलायमान होता
सा
वह
उपमा
उपमा
स्मृता
कही गई है
योगिनः
योगी की
यतचित्तस्य
नियंत्रित चित्त वाले
युञ्जतः
योग में लगे हुए
योगम्
योग में
आत्मनः
आत्मा का।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे वायुरहित स्थान में रखा हुआ दीपक नहीं चलायमान होता, ऐसी उपमा आत्मयोग में लगे हुए योगी के नियंत्रित चित्त के लिए कही गई है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योगी का चित्त निवात-दीप के समान स्थिर होता है – जैसे बिना हवा के स्थान पर दीपक की लौ स्थिर रहती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे वायु रहित स्थान में रखा दीपक स्थिर रहता है (नहीं डगमगाता), वैसी ही उपमा आत्म-योग में लगे हुए योगी के नियंत्रित चित्त के लिए कही गई है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योगी का मन सदा स्थिर रहता है, जैसे दीपक की लौ वायु के अभाव में। यह स्थिरता अभ्यास और वैराग्य से प्राप्त होती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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