श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 18

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यदा
जब
विनियतम्
अच्छी तरह नियंत्रित
चित्तम्
चित्त
आत्मनि
अपने में (स्वरूप में)
एव
ही
अवतिष्ठते
स्थित हो जाता है
निःस्पृहः
निःस्पृह (स्पृहा रहित)
सर्वकामेभ्यः
सब कामनाओं से
युक्तः
योगी
इति
इस प्रकार
उच्यते
कहा जाता है
तदा
तब।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब अच्छी तरह नियंत्रित चित्त अपने स्वरूप में ही स्थित हो जाता है और सब भोगों की इच्छाओं से रहित हो जाता है, तब वह युक्त (योगी) कहा जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योगी की परिभाषा: चित्त पूरी तरह से आत्मा में स्थित हो जाता है और सभी कामनाओं से मुक्त हो जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जब पूरी तरह से नियंत्रित चित्त आत्मा में ही स्थित हो जाता है और सभी कामनाओं से रहित हो जाता है, तब वह युक्त (योगी) कहलाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग का लक्ष्य है – चित्त की वृत्तियों का निरोध और आत्मा में स्थिति। यही सच्ची कामना-रहित अवस्था है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/47 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!