मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
7 पदयुक्ताहारविहारस्य
संयमित भोजन-विहार वाले
युक्तचेष्टस्य
संयमित चेष्टा (कर्म) वाले
कर्मसु
कर्मों में
युक्तस्वप्नावबोधस्य
संयमित सोने-जागने वाले
योगः
योग
भवति
होता है
दुःखहा
दुःखों का नाश करने वाला।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो भोजन-विहार में संयमी है, कर्मों में संयत है, सोने-जागने में संयमी है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योग की सिद्धि के लिए सभी गतिविधियों में संयम (युक्तता) आवश्यक है। ऐसा योग दुःखों का नाश करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो भोजन और विहार में संयमी है, कर्मों में संयत है, सोने और जागने में संयमी है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग केवल ध्यान तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संयम ही योग है। ऐसा संयम सभी दुःखों से छुटकारा दिलाता है।