श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 16

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
न
नहीं
अति अश्नतः
अधिक खाने वाले का
तु
तो
योगः
योग
अस्ति
होता है
न
नहीं
च
और
एकान्तम्
सर्वदा
अनश्नतः
न खाने वाले का
न
नहीं
च
और
अति
अधिक
स्वप्नशीलस्य
सोने वाले का
जाग्रतः
जागने वाले का
न
नहीं
एव
ही
च
और
अर्जुन
हे अर्जुन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे अर्जुन! न तो अधिक खाने वाले का योग सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; न अधिक सोने वाले का और न अधिक जागने वाले का।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योग के मार्ग में संयम आवश्यक है – भोजन और नींद दोनों में अति नहीं करनी चाहिए।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! न तो अधिक खाने वाले का, न बिल्कुल न खाने वाले का, न अधिक सोने वाले का, और न अधिक जागने वाले का योग सिद्ध होता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग का मार्ग मध्यम मार्ग है। शरीर और मन दोनों को संतुलित रखना आवश्यक है। न तो भोग में, न कष्ट में, बल्कि समत्व में योग सिद्ध होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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श्लोक 16/47 34% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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