मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
18 पदन
नहीं
अति अश्नतः
अधिक खाने वाले का
तु
तो
योगः
योग
अस्ति
होता है
न
नहीं
च
और
एकान्तम्
सर्वदा
अनश्नतः
न खाने वाले का
न
नहीं
च
और
अति
अधिक
स्वप्नशीलस्य
सोने वाले का
जाग्रतः
जागने वाले का
न
नहीं
एव
ही
च
और
अर्जुन
हे अर्जुन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! न तो अधिक खाने वाले का योग सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; न अधिक सोने वाले का और न अधिक जागने वाले का।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योग के मार्ग में संयम आवश्यक है – भोजन और नींद दोनों में अति नहीं करनी चाहिए।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! न तो अधिक खाने वाले का, न बिल्कुल न खाने वाले का, न अधिक सोने वाले का, और न अधिक जागने वाले का योग सिद्ध होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग का मार्ग मध्यम मार्ग है। शरीर और मन दोनों को संतुलित रखना आवश्यक है। न तो भोग में, न कष्ट में, बल्कि समत्व में योग सिद्ध होता है।