मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदयुञ्जन्
योग में लगाता हुआ
एवम्
इस प्रकार
सदा
सदा
आत्मानम्
अपने को
योगी
योगी
नियतमानसः
नियत (वश में किए) मन वाला
शान्तिम्
शान्ति
निर्वाणपरमाम्
परम निर्वाण रूप
मत्संस्थाम्
मुझमें स्थित
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस प्रकार सदा अपने मन को योग में लगाने वाला, नियत मन वाला योगी, मुझमें स्थित परम निर्वाण रूप शान्ति को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
निरंतर अभ्यास से योगी परम शांति (निर्वाण) को प्राप्त करता है, जो भगवान में स्थित है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस प्रकार सदा अपने मन को योग में लगाने वाला, नियंत्रित मन वाला योगी, मुझमें स्थित परम निर्वाण रूप शांति को प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग का अंतिम लक्ष्य परम शांति है, जो भगवत्प्राप्ति में स्थित है। निरंतर अभ्यास से यह प्राप्त होती है।