मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदप्रशान्तात्मा
शांत चित्त वाला
विगतभीः
भयरहित
ब्रह्मचारिव्रते
ब्रह्मचर्य व्रत में
स्थितः
स्थित
मनः
मन को
संयम्य
संयमित करके
मच्चित्तः
मुझमें चित्त लगाकर
युक्तः
योगी
आसीत
बैठे
मत्परः
मुझ परायण (मेरे परम लक्ष्य वाला)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
शान्त चित्त, भयरहित, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थिर, मन को वश में करके, मुझमें चित्त लगाकर और मुझको परम लक्ष्य मानकर बैठे।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ध्यान की आंतरिक स्थितियाँ: शांति, निर्भयता, ब्रह्मचर्य, मनोनिग्रह, और भगवत् चिन्तन।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
शांत चित्त, निर्भय, ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित, मन को संयमित करके, मुझमें चित्त लगाकर और मुझे परम लक्ष्य मानकर योगी बैठे।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ध्यान का अर्थ केवल शारीरिक मुद्रा नहीं, बल्कि मन की वृत्तियों का भगवान में लग जाना है। ब्रह्मचर्य (इन्द्रिय-संयम) इसके लिए आवश्यक है।