मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदसमम्
सीधा, समभाव से
काय-शिरः-ग्रीवम्
शरीर, सिर और गर्दन को
धारयन्
धारण करता हुआ
अचलम्
स्थिर
स्थिरः
स्थिर
सम्प्रेक्ष्य
देखता हुआ
नासिकाग्रम्
नासिका के अग्रभाग को
स्वम्
अपने
दिशः
दिशाओं को
च
और
अनवलोकयन्
न देखता हुआ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
शरीर, सिर और गर्दन को सीधा एवं स्थिर रखते हुए, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए, इधर-उधर न देखता हुआ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ध्यान की मुद्रा: शरीर, गर्दन और सिर सीधे रखें, दृष्टि नाक के अग्रभाग पर टिकाएं, और चारों ओर न देखें।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और स्थिर रखते हुए, नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाकर, इधर-उधर न देखते हुए ध्यान करे।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ध्यान के लिए शारीरिक स्थिरता आवश्यक है। सीधी रीढ़ से प्राण का प्रवाह सुचारू होता है। दृष्टि को एक बिंदु पर केंद्रित करने से मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है।