श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 1

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 3 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्री भगवानुवाच । अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
अनाश्रितः
बिना आश्रय लिए
कर्मफलम्
कर्म के फल का
कार्यम्
कर्तव्य
कर्म
कर्म
करोति
करता है
यः
जो
सः
वह
संन्यासी
संन्यासी
च
और
योगी
योगी
च
भी
न
नहीं
निरग्निः
अग्नि का त्याग करने वाला
न
नहीं
च
और
अक्रियः
कर्म त्याग करने वाला।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्री भगवान् बोले: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्यकर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, केवल अग्नि का त्याग करने वाला या क्रियाओं का त्याग करने वाला नहीं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् यहाँ स्पष्ट करते हैं कि सच्चा संन्यासी और योगी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल बाहरी क्रियाओं का त्याग करने वाला। True renunciation is inner detachment, not just external rituals.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि संन्यास और योग का सार कर्मफल के त्याग में है, न कि केवल क्रियाओं के त्याग में। जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करता है, बिना फल की आसक्ति के, वही वास्तव में संन्यासी और योगी है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

बाहरी त्याग से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक वैराग्य। हमें अपने कर्म करते रहना चाहिए, लेकिन फल की चिंता किए बिना। यही कर्मयोग का मार्ग है। External renunciation is not as important as inner detachment. One should perform their duties without attachment to results.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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