मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदयम्
जिसको
संन्यासम्
संन्यास
इति
इस प्रकार
प्राहुः
कहते हैं
योगम्
योग
तम्
उसको
विद्धि
जानो
पाण्डव
हे पाण्डुपुत्र
न
नहीं
हि
निश्चय ही
असंन्यस्तसङ्कल्पः
संकल्पों का त्याग न किए हुए
योगी
योगी
भवति
होता है
कश्चन
कोई भी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पाण्डुपुत्र! जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसे तू योग समझ। क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं हो सकता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
संन्यास और योग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं – मन की शुद्धि। संकल्प (इच्छाओं) का त्याग किए बिना योग सिद्ध नहीं होता। Renunciation of desires is essential for yoga.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसे तुम योग समझो। कोई भी व्यक्ति बिना संकल्पों (इच्छाओं) के त्याग के योगी नहीं बन सकता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग का मार्ग आंतरिक त्याग से शुरू होता है। बाहरी क्रियाओं का त्याग मात्र पर्याप्त नहीं है। मन से सभी कामनाओं का त्याग करना ही वास्तविक संन्यास है।