श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 3

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 3 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
आरुरुक्षोः
आरोहण की इच्छा रखने वाले
मुनेः
मुनि (योगी) के लिए
योगम्
योग में
कर्म
कर्म
कारणम्
साधन
उच्यते
कहा जाता है
योगारूढस्य
योग में आरूढ़ (स्थित) के लिए
तस्य
उसी
एव
ही
शमः
शम (सब क्रियाओं से उपराम)
कारणम्
साधन
उच्यते
कहा जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

योगारूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म ही साधन कहा जाता है और योगारूढ़ (सिद्ध) के लिए शम (सब कर्मों से उपराम हो जाना) ही साधन कहा जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योग के आरंभिक चरण में कर्म करना आवश्यक है, लेकिन एक बार योग में स्थित हो जाने पर सभी क्रियाओं से शांत हो जाना चाहिए। कर्म ही साधन है और शांति ही साध्य।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो साधक योग में आरूढ़ होना चाहता है, उसके लिए कर्म ही साधन है; लेकिन जो पहले से ही योग में स्थित है, उसके लिए सभी कर्मों से शांत हो जाना ही साधन है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

प्रारंभ में हमें कर्म करने चाहिए, लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमें कर्मों के प्रति आसक्ति छोड़नी होती है। अंत में, पूर्ण शांति में स्थित होना ही लक्ष्य है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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