मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदयदा
जब
हि
निश्चय ही
न
नहीं
इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रियों के विषयों में
न
नहीं
कर्मसु
कर्मों में
अनुषज्जते
आसक्त होता है
सर्वसंकल्पसंन्यासी
सब संकल्पों का त्यागी
योगारूढः
योगारूढ़
तदा
तब
उच्यते
कहा जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जब मनुष्य इन्द्रिय-विषयों में और कर्मों में आसक्त नहीं होता और सब संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहा जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योगारूढ़ वह है जो इन्द्रिय विषयों और कर्मों दोनों से अलिप्त रहता है, तथा सभी प्रकार के संकल्पों (इच्छाओं और कल्पनाओं) का त्याग कर चुका है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जब व्यक्ति इन्द्रिय विषयों में और कर्मों में आसक्त नहीं होता, और सभी संकल्पों (मानसिक कल्पनाओं) का त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग की सिद्धि का लक्षण है – इन्द्रियों के भोगों और कर्मों के प्रति मोह का न होना, तथा मन में किसी प्रकार की कामना का न उठना।