श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 5

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 3 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
उद्धरेत्
उद्धार करे
आत्मना
अपने द्वारा
आत्मानम्
अपना
न
नहीं
आत्मानम्
अपने को
अवसादयेत्
गिराए
आत्मा
अपना स्वयं
एव
ही
हि
निश्चय ही
आत्मनः
अपना
बन्धुः
मित्र
आत्मा
स्वयं
एव
ही
रिपुः
शत्रु
आत्मनः
अपना।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए और अपने को अधोगति में नहीं डालना चाहिए। क्योंकि यह मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

हमारा मन ही हमारा सबसे बड़ा मित्र या शत्रु हो सकता है। यदि हम मन को वश में कर लें तो वह हमारा उद्धार करता है, अन्यथा वही हमें पतन की ओर ले जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

व्यक्ति को अपने मन के द्वारा स्वयं को ऊपर उठाना चाहिए, नीचे नहीं गिराना चाहिए। मन ही अपना मित्र है और मन ही अपना शत्रु है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यदि हम मन को नियंत्रित कर लें, तो वह हमारी उन्नति में सहायक होता है। यदि मन वश में न हो, तो वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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