मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदउद्धरेत्
उद्धार करे
आत्मना
अपने द्वारा
आत्मानम्
अपना
न
नहीं
आत्मानम्
अपने को
अवसादयेत्
गिराए
आत्मा
अपना स्वयं
एव
ही
हि
निश्चय ही
आत्मनः
अपना
बन्धुः
मित्र
आत्मा
स्वयं
एव
ही
रिपुः
शत्रु
आत्मनः
अपना।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए और अपने को अधोगति में नहीं डालना चाहिए। क्योंकि यह मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
हमारा मन ही हमारा सबसे बड़ा मित्र या शत्रु हो सकता है। यदि हम मन को वश में कर लें तो वह हमारा उद्धार करता है, अन्यथा वही हमें पतन की ओर ले जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
व्यक्ति को अपने मन के द्वारा स्वयं को ऊपर उठाना चाहिए, नीचे नहीं गिराना चाहिए। मन ही अपना मित्र है और मन ही अपना शत्रु है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यदि हम मन को नियंत्रित कर लें, तो वह हमारी उन्नति में सहायक होता है। यदि मन वश में न हो, तो वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।