श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 6

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
बन्धुः
मित्र
आत्मा
अपना स्वयं
आत्मनः
अपने
तस्य
उसका
येन
जिसके द्वारा
आत्मा
मन
एव
ही
आत्मना
अपने द्वारा
जितः
जीत लिया गया है
अनात्मनः
जिसने अपने को नहीं जीता है
तु
तो
शत्रुत्वे
शत्रुता में
वर्तेत
वर्तता है
आत्मा
वही मन
एव
ही
शत्रुवत्
शत्रु के समान।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए वह मन सबसे अच्छा मित्र है; और जिसने मन को नहीं जीता है, उसके लिए वही मन शत्रु के समान आचरण करता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ आगे कहा गया है कि जिसने मन को जीत लिया, उसके लिए मन परम मित्र है; जो नहीं जीत सका, उसके लिए वही शत्रु बन जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिस व्यक्ति ने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए वह मन सबसे अच्छा मित्र बन जाता है। परंतु जिसने मन को नहीं जीता, उसके लिए वही मन सबसे बड़ा शत्रु बनकर कार्य करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग का उद्देश्य मन को वश में करना है, क्योंकि विजित मन ही सच्चा सहायक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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