भक्ति षटक (अध्याय ७-१२) अध्याय १२ · कुल २० श्लोक 5 मिनट अध्ययन

भक्ति योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १२ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

बारहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि सगुण साकार भक्त और निर्गुण ब्रह्म के उपासकों में श्रेष्ठ कौन है। कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सगुण भक्ति करने वाले भक्त अधिक सुगम मार्ग पर चलते हैं और वे स्वयं उन्हें शीघ्र मुक्ति प्रदान करते हैं।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १२ (भक्ति योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

बारहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि सगुण साकार भक्त और निर्गुण ब्रह्म के उपासकों में श्रेष्ठ कौन है। कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सगुण भक्ति करने वाले भक्त अधिक सुगम मार्ग पर चलते हैं और वे स्वयं उन्हें शीघ्र मुक्ति प्रदान करते हैं।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / १)

श्लोक १ - २०
अध्याय १२ · श्लोक १

अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १॥

हिंदी अर्थ

अर्जुन ने कहा: जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपकी उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर (ब्रह्म) की उपासना करते हैं, उनमें योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ कौन हैं?

अध्याय १२ · श्लोक २

श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २॥

हिंदी अर्थ

श्रीभगवान् ने कहा: जो मन को मुझमें लगाकर, नित्य युक्त होकर, परम श्रद्धा सहित मेरी उपासना करते हैं, वे मेरी दृष्टि में योगियों में सबसे श्रेष्ठ हैं।

अध्याय १२ · श्लोक ३

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम् ॥ ३॥

हिंदी अर्थ

परन्तु जो अक्षर (अविनाशी), अनिर्देश्य (अकथनीय), अव्यक्त (अप्रकट), सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ (निर्विकार), अचल और ध्रुव (शाश्वत) की उपासना करते हैं,

अध्याय १२ · श्लोक ४

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४॥

हिंदी अर्थ

सम्पूर्ण रूप से इन्द्रियों के समूह को वश में करके, सर्वत्र समान बुद्धि वाले, सब प्राणियों के हित में लगे हुए वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।

अध्याय १२ · श्लोक ५

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५॥

हिंदी अर्थ

जिनका चित्त अव्यक्त (निर्गुण ब्रह्म) में आसक्त है, उनके लिए क्लेश अधिक है, क्योंकि अव्यक्त गति (लक्ष्य) को देहधारी (साधक) बड़े कष्ट से प्राप्त करते हैं।

अध्याय १२ · श्लोक ६

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६॥

हिंदी अर्थ

परन्तु जो सब कर्मों को मुझमें समर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं,

अध्याय १२ · श्लोक ७

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७॥

हिंदी अर्थ

हे पार्थ, जिनका चित्त मुझमें लगा हुआ है, उनके लिए मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-सागर से उद्धार करने वाला हो जाता हूँ।

अध्याय १२ · श्लोक ८

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८॥

हिंदी अर्थ

मुझमें ही मन को लगाओ, मुझमें ही बुद्धि को लगाओ; इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं।

अध्याय १२ · श्लोक ९

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥ ९॥

हिंदी अर्थ

यदि तुम मुझमें चित्त को स्थिर रूप से नहीं लगा सकते, तो हे धनंजय, अभ्यासयोग द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा करो।

अध्याय १२ · श्लोक १०

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १०॥

हिंदी अर्थ

यदि तुम अभ्यास करने में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर हो जाओ। मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।

अध्याय १२ · श्लोक ११

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११॥

हिंदी अर्थ

यदि तुम ऐसा करने में भी असमर्थ हो, तो मेरे योग का आश्रय लेकर, समस्त कर्मों के फल का त्याग कर दो, आत्मवश होकर।

अध्याय १२ · श्लोक १२

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२॥

हिंदी अर्थ

अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है; ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है; ध्यान से कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है; त्याग से तुरंत शांति मिलती है।

अध्याय १२ · श्लोक १३

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३॥

हिंदी अर्थ

जो सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रभाव और करुणा रखता है, तथा ममता और अहंकार से रहित है, दुःख-सुख में समान रहता है और क्षमाशील है,

अध्याय १२ · श्लोक १४

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४॥

हिंदी अर्थ

सदा संतुष्ट रहने वाला, आत्मवश, दृढ़ निश्चय वाला, मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करने वाला जो योगी-भक्त है, वह मुझे प्रिय है।

अध्याय १२ · श्लोक १५

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५॥

हिंदी अर्थ

जिससे लोग उद्विग्न नहीं होते और जो लोगों से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष (क्रोध), भय और उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है।

अध्याय १२ · श्लोक १६

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६॥

हिंदी अर्थ

जो आशा-आकांक्षा से रहित, शुद्ध, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित और समस्त आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

अध्याय १२ · श्लोक १७

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७॥

हिंदी अर्थ

जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, तथा शुभ-अशुभ कर्मों का त्यागी है, वह भक्तिमान मुझे प्रिय है।

अध्याय १२ · श्लोक १८

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८॥

हिंदी अर्थ

जो शत्रु और मित्र में, तथा मान-अपमान में सम है, जो सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है, और संग से रहित है,

अध्याय १२ · श्लोक १९

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९॥

हिंदी अर्थ

जिसके लिए निन्दा और स्तुति समान है, मौनी है, जो किसी भी प्रकार से संतुष्ट रहता है, बिना घर का (आश्रम रहित), स्थिर बुद्धि वाला, ऐसा भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।

अध्याय १२ · श्लोक २०

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २०॥

हिंदी अर्थ

परन्तु जो इस धर्म्य अमृत (भक्तियोग) को, जैसा ऊपर कहा गया है, श्रद्धा सहित, मुझ परम परायण होकर सेवन करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
भक्ति योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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