श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 4

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
सन्नियम्य
having fully controlled
इन्द्रिय-ग्रामम्
the group of senses
सर्वत्र
everywhere
सम-बुद्धयः
even-minded
ते
they
प्राप्नुवन्ति
attain
माम्
Me
एव
certainly
सर्व-भूत-हिते
in the welfare of all beings
रताः
engaged.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सम्पूर्ण रूप से इन्द्रियों के समूह को वश में करके, सर्वत्र समान बुद्धि वाले, सब प्राणियों के हित में लगे हुए वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

निर्गुण उपासक इन्द्रियों को वश में करके, समदर्शी होकर और सबके हित में लगे रहकर अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं। यद्यपि मार्ग कठिन है, फिर भी लक्ष्य वही है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि जो निर्गुण ब्रह्म के उपासक हैं, वे इन्द्रियों को पूरी तरह वश में करके, सभी में समान भाव रखते हुए और सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हुए अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

चाहे सगुण हो या निर्गुण, साधना का अंतिम लक्ष्य ईश्वर-प्राप्ति ही है। निर्गुण मार्ग में इन्द्रिय-निग्रह, समता और लोक-हित की भावना आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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