मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदक्लेश
difficulty
अधिकतर
greater
तेषाम्
for those
अव्यक्त-आसक्त-चेतसाम्
whose minds are attached to the unmanifest
अव्यक्ता
the unmanifest
हि
indeed
गति
goal
दुःखम्
with difficulty
देहवद्भि
by the embodied
अवाप्यते
is attained.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिनका चित्त अव्यक्त (निर्गुण ब्रह्म) में आसक्त है, उनके लिए क्लेश अधिक है, क्योंकि अव्यक्त गति (लक्ष्य) को देहधारी (साधक) बड़े कष्ट से प्राप्त करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान अब स्पष्ट करते हैं कि निर्गुण ब्रह्म की उपासना का मार्ग अधिक कठिन है क्योंकि इन्द्रियों से परे उस निराकार तत्व पर मन को एकाग्र करना देहाभिमानी जीव के लिए अत्यंत दुष्कर है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि जिनका चित्त अव्यक्त (निर्गुण ब्रह्म) में लगा है, उनके लिए क्लेश अधिक है। क्योंकि अव्यक्त लक्ष्य को देहधारी जीव बड़े कष्ट से प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
निराकार ब्रह्म का ध्यान करना अत्यंत कठिन है क्योंकि मन और इन्द्रियाँ सदा साकार विषयों में भटकती हैं। इसलिए भक्तियोग सरल और अधिक प्रभावी माना गया है।