मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदये
who
तु
but
सर्वाणि
all
कर्माणि
actions
मयि
unto Me
संन्यस्य
renouncing
मत्-पराः
intent on Me
अनन्येन
exclusive
एव
certainly
योगेन
by yoga
माम्
Me
ध्यायन्त
meditating
उपासते
worship.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु जो सब कर्मों को मुझमें समर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं,
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अब भगवान सगुण भक्तों का वर्णन करते हैं जो सब कर्म मुझे समर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस श्लोक में भगवान उन भक्तों की विशेषता बताते हैं जो सगुण साकार रूप की उपासना करते हैं। वे सब कर्मों को भगवान को समर्पित कर देते हैं, भगवान में ही तत्पर रहते हैं, और अनन्य योग (एकाग्र भक्ति) से भगवान का ध्यान करते हुए उनकी उपासना करते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
अनन्य भक्ति का अर्थ है केवल ईश्वर में मन लगाना, किसी अन्य आश्रय की इच्छा न रखना। यह सर्वोच्च भक्ति है।