मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदतेषाम्
of them
अहम्
I
समुद्धर्ता
the deliverer
मृत्यु-संसार-सागरात्
from the ocean of death and transmigration
भवामि
become
न चिरात्
soon
पार्थ
O Partha
मयि
in Me
आवेशित-चेतसाम्
whose minds are absorbed.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ, जिनका चित्त मुझमें लगा हुआ है, उनके लिए मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-सागर से उद्धार करने वाला हो जाता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान वादा करते हैं कि जो अनन्य भक्त मुझमें चित्त लगाते हैं, उन्हें मैं शीघ्र ही जन्म-मृत्यु के सागर से पार करा देता हूँ। यह भक्तियोग की कृपा है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान अर्जुन से कहते हैं कि जिनका चित्त मुझमें पूरी तरह लगा हुआ है, उनके लिए मैं स्वयं ही शीघ्र ही इस जन्म-मृत्यु के संसार-सागर से उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति का मार्ग ईश्वर की कृपा से सरल हो जाता है। भक्त के उद्धार की जिम्मेदारी स्वयं ईश्वर लेते हैं।