मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदअद्वेष्टा
non-hating
सर्व-भूतानाम्
towards all beings
मैत्र
friendly
करुण
compassionate
एव
certainly
च
and
निर्मम
free from possessiveness
निरहङ्कार
free from ego
सम-दुःख-सुख
equal in sorrow and happiness
क्षमी
forgiving.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रभाव और करुणा रखता है, तथा ममता और अहंकार से रहित है, दुःख-सुख में समान रहता है और क्षमाशील है,
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अब भगवान भक्त के लक्षण बताते हैं। यहाँ से लेकर श्लोक 19 तक सात्विक भक्त के गुणों का वर्णन है। पहला गुण है अद्वेष्टा - किसी से द्वेष न करना, सबसे मैत्री और करुणा, ममता और अहंकार का अभाव, दुःख-सुख में समता, और क्षमाशीलता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: जो सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रवत् और करुणामय है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समान रहता है, और क्षमाशील है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति का वास्तविक लक्षण बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अन्तःकरण की पवित्रता और सबके प्रति प्रेमभाव है। ये गुण साधक को ईश्वर के समीप ले जाते हैं।