श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 14

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
सन्तुष्ट
content
सततम्
always
योगी
the yogi
यत-आत्मा
self-controlled
दृढ-निश्चय
of firm resolve
मयि
in Me
अर्पित-मनः-बुद्धि
with mind and intellect offered
य
who
मत्-भक्त
My devotee
स
he
मे
to Me
प्रिय
dear.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सदा संतुष्ट रहने वाला, आत्मवश, दृढ़ निश्चय वाला, मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करने वाला जो योगी-भक्त है, वह मुझे प्रिय है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ भक्त के और गुण बताए गए हैं - सदा संतुष्ट, आत्मवश (इन्द्रियों पर नियंत्रण), दृढ़ निश्चय, और मन-बुद्धि से ईश्वर में अर्पित। ऐसा भक्त प्रिय है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो योगी सदा संतुष्ट रहता है, आत्मसंयमी है, दृढ़ निश्चय वाला है, और जिसने मन और बुद्धि मुझमें अर्पित कर दी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सच्चा भक्त बाह्य परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, उसका ध्यान केवल ईश्वर पर होता है। आत्म-नियंत्रण और दृढ़ता भक्ति के आवश्यक अंग हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
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श्लोक 14/20 70% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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