श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 15

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
यस्मात्
from whom
न
not
उद्विजते
is agitated
लोक
people
लोकात्
by people
न
not
उद्विजते
is agitated
च
and
य
who
हर्ष
by joy
अमर्ष
intolerance
भय
fear
उद्वेगै
by anxiety
मुक्त
freed
य
who
स
he
च
also
मे
to Me
प्रिय
dear.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिससे लोग उद्विग्न नहीं होते और जो लोगों से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष (क्रोध), भय और उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्त का यह गुण है कि वह न किसी को उद्वेलित करता है, न स्वयं किसी से उद्वेलित होता है। वह सांसारिक भावनाओं - हर्ष, क्रोध, भय, चिंता - से मुक्त रहता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, क्रोध, भय और चिंता से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

संतुलित मन वाला भक्त दूसरों के लिए कभी कष्ट का कारण नहीं बनता और न ही दूसरों से कष्ट पाता है। वह स्थिरचित्त होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
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श्लोक 15/20 75% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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