मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
19 पदयस्मात्
from whom
न
not
उद्विजते
is agitated
लोक
people
लोकात्
by people
न
not
उद्विजते
is agitated
च
and
य
who
हर्ष
by joy
अमर्ष
intolerance
भय
fear
उद्वेगै
by anxiety
मुक्त
freed
य
who
स
he
च
also
मे
to Me
प्रिय
dear.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिससे लोग उद्विग्न नहीं होते और जो लोगों से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष (क्रोध), भय और उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भक्त का यह गुण है कि वह न किसी को उद्वेलित करता है, न स्वयं किसी से उद्वेलित होता है। वह सांसारिक भावनाओं - हर्ष, क्रोध, भय, चिंता - से मुक्त रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, क्रोध, भय और चिंता से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
संतुलित मन वाला भक्त दूसरों के लिए कभी कष्ट का कारण नहीं बनता और न ही दूसरों से कष्ट पाता है। वह स्थिरचित्त होता है।