श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 16

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
अनपेक्ष
indifferent
शुचि
pure
दक्ष
dexterous
उदासीन
neutral
गत-व्यथ
free from distress
सर्व-आरम्भ-परित्यागी
renouncing all undertakings
य
who
मत्-भक्त
My devotee
स
he
मे
to Me
प्रिय
dear.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो आशा-आकांक्षा से रहित, शुद्ध, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित और समस्त आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अनपेक्षः - किसी की अपेक्षा न रखना; शुचिः - बाहर-भीतर से शुद्ध; दक्षः - समर्थ; उदासीनः - तटस्थ; गतव्यथः - खेद रहित; सर्वारम्भपरित्यागी - नए कर्मों के आरम्भ का त्यागी। ऐसा भक्त प्रिय है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो निरपेक्ष, शुद्ध, चतुर, तटस्थ, दुःखरहित और सभी आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति का अर्थ है ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता, जिससे सांसारिक अपेक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं। ऐसा भक्त निर्मल, कुशल और स्थितप्रज्ञ होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
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श्लोक 16/20 80% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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