मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदअनपेक्ष
indifferent
शुचि
pure
दक्ष
dexterous
उदासीन
neutral
गत-व्यथ
free from distress
सर्व-आरम्भ-परित्यागी
renouncing all undertakings
य
who
मत्-भक्त
My devotee
स
he
मे
to Me
प्रिय
dear.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो आशा-आकांक्षा से रहित, शुद्ध, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित और समस्त आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अनपेक्षः - किसी की अपेक्षा न रखना; शुचिः - बाहर-भीतर से शुद्ध; दक्षः - समर्थ; उदासीनः - तटस्थ; गतव्यथः - खेद रहित; सर्वारम्भपरित्यागी - नए कर्मों के आरम्भ का त्यागी। ऐसा भक्त प्रिय है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो निरपेक्ष, शुद्ध, चतुर, तटस्थ, दुःखरहित और सभी आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति का अर्थ है ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता, जिससे सांसारिक अपेक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं। ऐसा भक्त निर्मल, कुशल और स्थितप्रज्ञ होता है।