श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 17

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 2 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
य
who
न
not
हृष्यति
rejoices
न
not
द्वेष्टि
hates
न
not
शोचति
grieves
न
not
काङ्क्षति
desires
शुभ-अशुभ-परित्यागी
renouncing good and evil
भक्तिमान
full of devotion
य
who
स
he
मे
to Me
प्रिय
dear.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, तथा शुभ-अशुभ कर्मों का त्यागी है, वह भक्तिमान मुझे प्रिय है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ भक्त के और गुण - न हर्ष, न द्वेष, न शोक, न कामना, तथा शुभाशुभ का त्यागी। ऐसा भक्त पूर्णतः समर्पित है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, और शुभ-अशुभ का त्यागी है, ऐसा भक्तिमान मुझे प्रिय है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्त द्वन्द्वों से परे हो जाता है। वह सुख-दुःख, लाभ-हानि, शुभ-अशुभ से ऊपर उठकर केवल ईश्वर में स्थित रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
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श्लोक 17/20 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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