मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदय
who
न
not
हृष्यति
rejoices
न
not
द्वेष्टि
hates
न
not
शोचति
grieves
न
not
काङ्क्षति
desires
शुभ-अशुभ-परित्यागी
renouncing good and evil
भक्तिमान
full of devotion
य
who
स
he
मे
to Me
प्रिय
dear.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, तथा शुभ-अशुभ कर्मों का त्यागी है, वह भक्तिमान मुझे प्रिय है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ भक्त के और गुण - न हर्ष, न द्वेष, न शोक, न कामना, तथा शुभाशुभ का त्यागी। ऐसा भक्त पूर्णतः समर्पित है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, और शुभ-अशुभ का त्यागी है, ऐसा भक्तिमान मुझे प्रिय है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्त द्वन्द्वों से परे हो जाता है। वह सुख-दुःख, लाभ-हानि, शुभ-अशुभ से ऊपर उठकर केवल ईश्वर में स्थित रहता है।