मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदसम
equal
शत्रौ
to an enemy
च
and
मित्रे
to a friend
च
and
तथा
also
मान-अपमानयो
in honor and dishonor
शीत-उष्ण-सुख-दुःखेषु
in cold, heat, pleasure, pain
सम
equal
सङ्ग-विवर्जित
free from association.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो शत्रु और मित्र में, तथा मान-अपमान में सम है, जो सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है, और संग से रहित है,
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
समता का वर्णन: शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख में समभाव, और संगवर्जित (आसक्ति रहित)।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो शत्रु और मित्र में समान है, मान और अपमान में समान है, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में समान है, और आसक्ति से रहित है,
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति की परिपक्वता में समता का भाव आता है। सभी परिस्थितियों में मन समान रहता है, क्योंकि वह ईश्वर में स्थित है।