श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 18

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 2 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
सम
equal
शत्रौ
to an enemy
च
and
मित्रे
to a friend
च
and
तथा
also
मान-अपमानयो
in honor and dishonor
शीत-उष्ण-सुख-दुःखेषु
in cold, heat, pleasure, pain
सम
equal
सङ्ग-विवर्जित
free from association.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो शत्रु और मित्र में, तथा मान-अपमान में सम है, जो सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है, और संग से रहित है,

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

समता का वर्णन: शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख में समभाव, और संगवर्जित (आसक्ति रहित)।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो शत्रु और मित्र में समान है, मान और अपमान में समान है, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में समान है, और आसक्ति से रहित है,

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति की परिपक्वता में समता का भाव आता है। सभी परिस्थितियों में मन समान रहता है, क्योंकि वह ईश्वर में स्थित है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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