भक्ति षटक (अध्याय ७-१२) अध्याय ९ · कुल ३४ श्लोक 4 मिनट अध्ययन

राज विद्या राज गुह्य योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ९ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

नौवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सबसे गोपनीय और श्रेष्ठ ज्ञान (राजविद्या) का उपदेश देते हैं। वह बताते हैं कि कैसे वह सब व्याप्त हैं, फिर भी उनमें आसक्ति नहीं है, और कैसे साधारण भक्ति भी उन्हें प्राप्त करा सकती है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ९ (राज विद्या राज गुह्य योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

नौवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सबसे गोपनीय और श्रेष्ठ ज्ञान (राजविद्या) का उपदेश देते हैं। वह बताते हैं कि कैसे वह सब व्याप्त हैं, फिर भी उनमें आसक्ति नहीं है, और कैसे साधारण भक्ति भी उन्हें प्राप्त करा सकती है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / २)

श्लोक १ - २५
अध्याय ९ · श्लोक १

श्रीभगवानुवाच | इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे | ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || १||

हिंदी अर्थ

श्री भगवान् बोले: तू निंदारहित है, इसलिये तुझको मैं विज्ञान सहित इस ज्ञान को जो कि सबसे अधिक गोपनीय है, अब कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जायेगा।

अध्याय ९ · श्लोक २

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् | प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || २||

हिंदी अर्थ

यह (ज्ञान) राजविद्या (विद्याओं का राजा) है, राजगुह्य (रहस्यों का राजा) है, अत्यन्त पवित्र करने वाला है, उत्तम है, प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला है, धर्मयुक्त है, साधन में अत्यन्त सुखद है और अविनाशी है।

अध्याय ९ · श्लोक ३

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप | अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || ३||

हिंदी अर्थ

हे परंतप (अर्जुन)! इस धर्म (भक्तियोग) में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार-मार्ग में ही आते-जाते रहते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक ४

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४||

हिंदी अर्थ

यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक ५

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् | भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः || ५||

हिंदी अर्थ

और न ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं (इस प्रकार समझो) – मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। मैं सब प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सब प्राणियों का उत्पादक है।

अध्याय ९ · श्लोक ६

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || ६||

हिंदी अर्थ

जैसे सर्वत्र गमन करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा तुम समझो।

अध्याय ९ · श्लोक ७

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७||

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से उत्पन्न करता हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक ८

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८||

हिंदी अर्थ

अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस समस्त प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश होता है।

अध्याय ९ · श्लोक ९

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय | उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || ९||

हिंदी अर्थ

हे धनञ्जय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति रहित, उदासीन के समान स्थित हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक १०

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || १०||

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! मेरे अध्यक्ष रहने से प्रकृति चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती है, और इसी कारण यह जगत् बार-बार परिवर्तित होता रहता है।

अध्याय ९ · श्लोक ११

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् | परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् || ११||

हिंदी अर्थ

मूढ़ लोग मुझे मनुष्य रूप में धारण किये हुए (देखकर) तिरस्कार करते हैं। वे सम्पूर्ण भूतों के महेश्वर मेरे परम भाव को नहीं जानते।

अध्याय ९ · श्लोक १२

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः || १२||

हिंदी अर्थ

वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञान वाले और विवेकहीन होते हैं, तथा राक्षसी और आसुरी मोहिनी प्रकृति को ही आश्रय किए रहते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक १३

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः | भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || १३||

हिंदी अर्थ

हे पार्थ! परन्तु महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित होकर, मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि-कारण और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक १४

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः | नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || १४||

हिंदी अर्थ

निरन्तर मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत वाले और यत्नशील होकर, तथा भक्तिपूर्वक मुझे नमस्कार करते हुए, वे नित्ययुक्त होकर मेरी उपासना करते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक १५

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते | एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || १५||

हिंदी अर्थ

और अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं – वे मुझे एकरूप, अनेकरूप तथा विश्वमुख (सर्वत्र व्याप्त) रूप में पूजते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक १६

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् | मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || १६||

हिंदी अर्थ

मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा (पितरों को दी जाने वाली वस्तु) हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मन्त्र हूँ, मैं आज्य (घी) हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं हवन हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक १७

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः | वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च || १७||

हिंदी अर्थ

मैं इस जगत् का पिता, माता, धाता (पालनकर्ता) और पितामह हूँ; मैं जानने योग्य हूँ, पवित्रकर्ता हूँ, ओंकार हूँ तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक १८

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् | प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् || १८||

हिंदी अर्थ

मैं गति (परम लक्ष्य) हूँ, भर्ता (धारण करने वाला) हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास हूँ, शरण हूँ, सुहृत् (हितैषी) हूँ, उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, स्थान हूँ, निधान (आश्रय) हूँ और अविनाशी बीज हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक १९

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||

हिंदी अर्थ

मैं सूर्य रूप में तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक २०

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते | ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || २०||

हिंदी अर्थ

तीनों वेदों को जानने वाले, सोमपान करने वाले, पापों से मुक्त हुए (कर्मकाण्डी) लोग यज्ञों द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हैं। वे पुण्य का फल पाकर इन्द्रलोक में प्रवेश कर वहाँ दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक २१

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति | एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते || २१||

हिंदी अर्थ

वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य के क्षीण होने पर मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का अनुसरण करने वाले कामनाओं के इच्छुक लोग आवागमन को प्राप्त होते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक २२

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || २२||

हिंदी अर्थ

जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

अध्याय ९ · श्लोक २३

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || २३||

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, किन्तु अविधिपूर्वक।

अध्याय ९ · श्लोक २४

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च | न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते || २४||

हिंदी अर्थ

क्योंकि मैं ही सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ। परन्तु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए (स्वर्ग से) गिर जाते हैं।

अध्याय ९ · श्लोक २५

यान्ति देवव्रता देवान्पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः | भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् || २५||

हिंदी अर्थ

देवताओं के उपासक देवताओं को जाते हैं, पितरों के उपासक पितरों को, भूतों की पूजा करने वाले भूतों को जाते हैं, और मेरे उपासक मुझे ही प्राप्त होते हैं।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
राज विद्या राज गुह्य योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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