श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 15

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते | एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || १५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
ज्ञान-यज्ञेन
ज्ञान-यज्ञ द्वारा
च
और
अपि
भी
अन्ये
अन्य लोग
यजन्तः
यज्ञ करते हुए
माम्
मेरी
उपासते
उपासना करते हैं
एकत्वेन
एकत्व से
पृथक्त्वेन
पृथक्त्व से
बहुधा
अनेक प्रकार से
विश्वतः-मुखम्
विश्वरूप।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं – वे मुझे एकरूप, अनेकरूप तथा विश्वमुख (सर्वत्र व्याप्त) रूप में पूजते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ भगवान की उपासना के विभिन्न दार्शनिक मार्गों का संकेत है: अद्वैत (एकत्व), विशिष्टाद्वैत (पृथक्त्व), और विश्वरूप (बहुधा विश्वतोमुख) के रूप में।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अन्य साधक ज्ञान-यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं – वे मुझे एकरूप में, पृथक-पृथक रूप में, तथा विश्वमुख (सर्वव्यापी) रूप में पूजते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर की उपासना अनेक प्रकार से की जा सकती है – निर्गुण, सगुण, विश्वरूप आदि। सब मार्ग अन्ततः उसी परम सत्य तक पहुँचाते हैं। साधक अपनी रुचि और अधिकार के अनुसार किसी भी मार्ग को अपना सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/34 44% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!