मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् | मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || १६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदअहम्
मैं
क्रतुः
क्रतु (वैदिक याग)
अहम्
मैं
यज्ञः
यज्ञ
स्वधा
स्वधा (पितरों के लिए अन्न)
अहम्
मैं
अहम्
मैं
औषधम्
औषधि
मन्त्रः
मन्त्र
अहम्
मैं
अहम्
मैं
एव
ही
आज्यम्
घी
अहम्
मैं
अग्निः
अग्नि
अहम्
मैं
हुतम्
हवन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा (पितरों को दी जाने वाली वस्तु) हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मन्त्र हूँ, मैं आज्य (घी) हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं हवन हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ भगवान ने कहा है कि वे स्वयं सम्पूर्ण यज्ञीय प्रक्रिया के सभी अंग हैं। इससे यह भाव आता है कि यज्ञ कर्ता को भगवान की व्यापकता का बोध होना चाहिए।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मन्त्र हूँ, मैं घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं हवन हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान सर्वव्यापी हैं। वे हर क्रिया के कर्ता, साधन और फल हैं। इस प्रकार उपासक को सब कुछ भगवान में ही देखना चाहिए, जिससे भक्ति और समर्पण बढ़ता है।