श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 17

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 2 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः | वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च || १७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
पिता
पिता
अहम्
मैं
अस्य
इस
जगतः
जगत् का
माता
माता
धाता
धारण करने वाला
पितामहः
पितामह
वेद्यम्
जानने योग्य
पवित्रम्
पवित्र करने वाला
ओंकार
ओंकार
ऋक्
ऋग्वेद
साम
सामवेद
यजुः
यजुर्वेद
एव
ही
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं इस जगत् का पिता, माता, धाता (पालनकर्ता) और पितामह हूँ; मैं जानने योग्य हूँ, पवित्रकर्ता हूँ, ओंकार हूँ तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान सृष्टि के सम्बन्धों में भी व्याप्त हैं – पिता, माता, पालक, पितामह। वे वेदों के प्रतीक ओंकार तथा स्वयं तीनों वेद हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं इस जगत् का पिता, माता, धाता (पालनकर्ता) और पितामह हूँ। मैं जानने योग्य, पवित्र करने वाला, ओंकार तथा ऋक्, साम और यजुर्वेद भी हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर हमारे सबसे निकट के सम्बन्धी हैं – पिता से भी अधिक स्नेही, माता से भी अधिक वात्सल्यमयी। उन्हीं की शरण में जाना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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