मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् | प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् || १८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदगति
गति (लक्ष्य)
भर्ता
भर्ता (धारण करने वाला)
प्रभुः
प्रभु (स्वामी)
साक्षी
साक्षी
निवासः
निवास
शरणम्
शरण
सुहृत्
सुहृद् (मित्र)
प्रभवः
उत्पत्ति
प्रलयः
प्रलय
स्थानम्
स्थान
निधानम्
निधान (आश्रय)
बीजम्
बीज
अव्ययम्
अविनाशी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं गति (परम लक्ष्य) हूँ, भर्ता (धारण करने वाला) हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास हूँ, शरण हूँ, सुहृत् (हितैषी) हूँ, उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, स्थान हूँ, निधान (आश्रय) हूँ और अविनाशी बीज हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ भगवान ने अपने अनेक रूपों का वर्णन किया है – वे ही सब कुछ हैं। इससे उनकी सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता सिद्ध होती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मैं गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सुहृत्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान और अविनाशी बीज हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर ही सब कुछ है। वही हमारा लक्ष्य, आश्रय, साक्षी और मित्र है। उसे पहचानकर हम जीवन में सुरक्षित हो जाते हैं।