श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 19

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 2 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
तपामि
तपाता हूँ
अहम्
मैं
अहम्
मैं
वर्षम्
वर्षा
निगृह्णामि
रोकता हूँ
उत्सृजामि
बरसाता हूँ
च
और
अमृतम्
अमृत
च
और
एव
ही
मृत्युः
मृत्यु
च
और
सत्
सत्
असत्
असत्
च
और
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं सूर्य रूप में तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान प्रकृति की समस्त क्रियाओं के नियन्ता हैं। वे ही अमृत और मृत्यु हैं, वे ही सत् (व्यक्त) और असत् (अव्यक्त) हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं (सूर्यरूप से) तपता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर ही जीवन और मृत्यु का स्वामी है। वही सृष्टि के सभी विपरीत युगलों (द्वन्द्वों) का मूल है। उसकी इच्छा से ही सब कुछ होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 19/34 56% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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