मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदतपामि
तपाता हूँ
अहम्
मैं
अहम्
मैं
वर्षम्
वर्षा
निगृह्णामि
रोकता हूँ
उत्सृजामि
बरसाता हूँ
च
और
अमृतम्
अमृत
च
और
एव
ही
मृत्युः
मृत्यु
च
और
सत्
सत्
असत्
असत्
च
और
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं सूर्य रूप में तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान प्रकृति की समस्त क्रियाओं के नियन्ता हैं। वे ही अमृत और मृत्यु हैं, वे ही सत् (व्यक्त) और असत् (अव्यक्त) हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मैं (सूर्यरूप से) तपता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर ही जीवन और मृत्यु का स्वामी है। वही सृष्टि के सभी विपरीत युगलों (द्वन्द्वों) का मूल है। उसकी इच्छा से ही सब कुछ होता है।