मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते | ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || २०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदत्रै-विद्या
तीनों वेदों के जानने वाले
माम्
मेरी
सोम-पाः
सोमपान करने वाले
पूत-पापाः
पापों से मुक्त
यज्ञैः
यज्ञों द्वारा
इष्ट्वा
पूजा करके
स्वर्ग-गतिम्
स्वर्ग की प्राप्ति
प्रार्थयन्ते
प्रार्थना करते हैं
ते
वे
पुण्यम्
पुण्यमय
आसाद्य
प्राप्त करके
सुरेन्द्र-लोकम्
इन्द्रलोक को
अश्नन्ति
भोगते हैं
दिव्यान्
दिव्य
दिवि
स्वर्ग में
देव-भोगान्
देवताओं के भोग।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तीनों वेदों को जानने वाले, सोमपान करने वाले, पापों से मुक्त हुए (कर्मकाण्डी) लोग यज्ञों द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हैं। वे पुण्य का फल पाकर इन्द्रलोक में प्रवेश कर वहाँ दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ कर्मकाण्डी वैदिक साधकों का वर्णन है जो यज्ञ करके स्वर्ग की कामना करते हैं। वे भगवान की अप्रत्यक्ष रूप से पूजा करते हैं, किन्तु सकाम भाव से।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
तीनों वेदों के ज्ञाता, सोमपान करने वाले, पापरहित लोग यज्ञों द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्रार्थना करते हैं। वे पुण्य प्राप्त कर इन्द्रलोक पहुँचकर दिव्य देवभोगों को भोगते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सकाम भक्ति भी भगवान की ही होती है, किन्तु उसका फल सीमित और नश्वर होता है। स्वर्ग के भोग भी समाप्त हो जाते हैं। इसलिए निष्काम भक्ति श्रेष्ठ है।