मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति | एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते || २१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदते
वे
तम्
उस
भुक्त्वा
भोगकर
स्वर्ग-लोकम्
स्वर्गलोक
विशालम्
विशाल
क्षीणे
समाप्त होने पर
पुण्ये
पुण्य के
मर्त्य-लोकम्
मृत्युलोक (पृथ्वी) में
विशन्ति
प्रवेश करते हैं
एवम्
इस प्रकार
त्रयी-धर्मम्
तीन वेदों के धर्म में
अनुप्रपन्नाः
आसक्त हुए
गत-आगतम्
आना-जाना
काम-कामाः
कामनाओं वाले
लभन्ते
प्राप्त करते हैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य के क्षीण होने पर मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का अनुसरण करने वाले कामनाओं के इच्छुक लोग आवागमन को प्राप्त होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
स्वर्ग के भोग समाप्त होने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। यह संसार-चक्र है। इससे मुक्ति निष्काम भक्ति से ही मिलती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य समाप्त होने पर पुनः मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस प्रकार तीन वेदों के धर्म में आसक्त कामनाओं वाले लोग आवागमन को प्राप्त होते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
स्वर्ग की प्राप्ति भी अस्थायी है। इसलिए साधक को स्थायी मोक्ष की कामना करनी चाहिए, जो भगवद-प्राप्ति से मिलता है।