मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च | न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते || २४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदअहम्
मैं
हि
निश्चय ही
सर्व-यज्ञानाम्
सब यज्ञों का
भोक्ता
भोक्ता
च
और
प्रभु
स्वामी
एव
ही
च
भी
न
नहीं
तु
परन्तु
माम्
मुझे
अभिजानन्ति
जानते हैं
तत्त्वेन
तत्त्व से
अतः
इसलिए
च्यवन्ति
गिर जाते हैं
ते
वे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
क्योंकि मैं ही सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ। परन्तु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए (स्वर्ग से) गिर जाते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान ही सब यज्ञों के फल के भोक्ता और स्वामी हैं। जो यह नहीं जानते, वे यज्ञों के सीमित फल (स्वर्ग) को भोगकर पुनः गिर जाते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मैं ही समस्त यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूँ। परन्तु वे (देवताओं के उपासक) मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए (स्वर्ग से) गिर जाते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
जब तक साधक को यह नहीं पता कि सब कुछ भगवान का है और वे ही अन्तिम फलदाता हैं, तब तक वह अस्थायी फलों में उलझा रहता है। भगवान का साक्षात् ज्ञान ही मुक्ति देता है।