श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 25

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यान्ति देवव्रता देवान्पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः | भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् || २५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यान्ति
जाते हैं
देव-व्रता
देवताओं के उपासक
देवान्
देवताओं को
पितृ़न्
पितरों को
यान्ति
जाते हैं
पितृ-व्रताः
पितरों के उपासक
भूतानि
भूत-प्रेत
यान्ति
जाते हैं
भूत-इज्याः
भूतों की पूजा करने वाले
यान्ति
जाते हैं
मत्-याजिनः
मेरे उपासक
अपि
भी
माम्
मुझे।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

देवताओं के उपासक देवताओं को जाते हैं, पितरों के उपासक पितरों को, भूतों की पूजा करने वाले भूतों को जाते हैं, और मेरे उपासक मुझे ही प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक उपासना के फल में भेद दिखाता है। जैसी भावना, वैसी प्राप्ति। भगवान के उपासकों को सर्वोच्च फल मिलता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

देवताओं के उपासक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों के उपासक पितरों को, भूतों के उपासक भूतों को, और मेरे उपासक मुझे प्राप्त होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मनुष्य की भावना और उपास्य के अनुरूप ही उसे फल मिलता है। अतः श्रेष्ठतम फल की इच्छा रखने वाले को परमात्मा की उपासना करनी चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 25/34 74% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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