मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति | तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः || २६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदपत्रम्
पत्ता
पुष्पम्
फूल
फलम्
फल
तोयम्
जल
यः
जो
मे
मुझे
भक्त्या
भक्ति से
प्रयच्छति
अर्पित करता है
तत्
उसे
अहम्
मैं
भक्ति-उपहृतम्
भक्तिपूर्वक अर्पित
अश्नामि
स्वीकार करता हूँ
प्रयत-आत्मनः
शुद्ध चित्त वाले (भक्त) का।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो कोई भक्ति से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पण करता है, उस प्रयतचित्त (शुद्ध हृदय) भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पित किया हुआ पदार्थ मैं स्वीकार करता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक है जो भक्ति की सरलता और सर्वसुलभता को दर्शाता है। भगवान को महँगे भोग नहीं, बल्कि प्रेमपूर्वक अर्पित किया हुआ तुच्छ से तुच्छ पदार्थ भी प्रिय है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो भक्त मुझे भक्तिपूर्वक पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध चित्त वाले भक्त के उस प्रेम-पूर्वक अर्पित किए हुए पदार्थ को मैं स्वीकार करता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान को हमारी सम्पत्ति नहीं, हमारा प्रेम चाहिए। सच्ची भक्ति में महँगे साधनों की आवश्यकता नहीं। सादा जीवन, शुद्ध हृदय और सरल प्रेम ही भगवान को सबसे अधिक प्रिय है।