मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् | यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || २७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदयत्
जो
करोषि
तू करता है
यत्
जो
अश्नासि
तू खाता है
यत्
जो
जुहोषि
तू हवन करता है
ददासि
तू दान देता है
यत्
जो
तपस्यसि
तू तप करता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
तत्
उसे
कुरुष्व
कर
मत्-अर्पणम्
मुझे अर्पित कर।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! तू जो कुछ करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है, और जो तप करता है – उसे मुझे अर्पित करके कर।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ भगवान सभी क्रियाओं को उन्हें समर्पित करने की सीख देते हैं। इससे कर्म योग और भक्ति का समन्वय होता है। सब कुछ भगवान के लिए करने से बंधन नहीं होता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ भी करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है, और जो तप करता है, उसे मुझे अर्पित करके कर।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देने से कर्म बंधन का कारण नहीं रहते। यही कर्मयोग है। इससे मनुष्य निष्काम होकर कर्तव्य करता है और मुक्ति की ओर बढ़ता है।