मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः | संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि || २८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदशुभ-अशुभ-फलैः
शुभ और अशुभ फलों से
एवम्
इस प्रकार
मोक्ष्यसे
तू मुक्त हो जाएगा
कर्म-बन्धनैः
कर्मों के बन्धनों से
संन्यास-योग-युक्त-आत्मा
संन्यासयोग से युक्त चित्त वाला
विमुक्तः
मुक्त होकर
माम्
मुझे
उपैष्यसि
प्राप्त होगा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस प्रकार तू शुभाशुभ फलों वाले कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाएगा। संन्यासयोग से युक्त चित्त होकर मुक्त हो तू मुझे प्राप्त होगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सब कर्म भगवान को अर्पित करने से फल-बन्धन नहीं रहता। यही सच्चा संन्यास (त्याग) है। इस प्रकार मुक्त होकर भक्त भगवान को प्राप्त होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस प्रकार तू शुभ और अशुभ फलों वाले कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाएगा। संन्यासयोग से युक्त चित्त होकर मुक्त होकर तू मुझे प्राप्त होगा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
कर्मों को ईश्वर को अर्पित करना ही सच्चा संन्यास है। इससे कर्म बन्धन नहीं करते और साधक क्रमशः मोक्ष को प्राप्त होता है।