मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः | ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || २९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदसमः
समान
अहम्
मैं
सर्व-भूतेषु
सम्पूर्ण प्राणियों में
न
नहीं
मे
मुझे
द्वेष्यः
द्वेष करने योग्य
अस्ति
है
न
नहीं
प्रियः
प्रिय
ये
जो
भजन्ति
भजते हैं
तु
तो
माम्
मुझे
भक्त्या
भक्ति से
मयि
मुझमें
ते
वे
तेषु
उनमें
च
और
अपि
भी
अहम्
मैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव से स्थित हूँ। मुझे न कोई द्वेष्य है और न कोई प्रिय। परन्तु जो मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान निष्पक्ष हैं, सबके प्रति समान। लेकिन भक्तों के प्रति उनकी विशेष कृपा होती है, इसलिए वे भक्तों में और भक्त उनमें निवास करते हैं। यह भक्ति का रहस्य है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान हूँ; मुझे कोई द्वेष्य या प्रिय नहीं है। परन्तु जो भक्त मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर निष्पक्ष है, पर भक्तों के प्रति उसका विशेष अनुराग है। भक्त और भगवान में प्रेम का अद्वैत सम्बन्ध स्थापित होता है।