श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 30

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् | साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः || ३०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अपि
यद्यपि
चेत्
यदि
सु-दुराचारः
अत्यन्त दुराचारी
भजते
भजता है
माम्
मुझे
अनन्य-भाक्
अनन्य भाव से
साधु
साधु
एव
ही
स
वह
मन्तव्यः
मानना चाहिए
सम्यक्
सम्यक् (ठीक)
व्यवसितः
निश्चय किया
हि
निश्चय ही
सः
वह।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही समझने योग्य है, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय कर लिया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्ति की महिमा इतनी प्रबल है कि वह पापी को भी तत्काल पवित्र कर देती है। ऐसा व्यक्ति साधु के समान पूज्य है क्योंकि उसका संकल्प भगवान की ओर है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय (भगवत्प्राप्ति का दृढ़ संकल्प) कर लिया है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति सबसे बड़ी शुद्धिकर्ता है। पतित से पतित व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से भगवान को पकड़ ले, तो उसका उद्धार निश्चित है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 30/34 88% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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