मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् | साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः || ३०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदअपि
यद्यपि
चेत्
यदि
सु-दुराचारः
अत्यन्त दुराचारी
भजते
भजता है
माम्
मुझे
अनन्य-भाक्
अनन्य भाव से
साधु
साधु
एव
ही
स
वह
मन्तव्यः
मानना चाहिए
सम्यक्
सम्यक् (ठीक)
व्यवसितः
निश्चय किया
हि
निश्चय ही
सः
वह।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही समझने योग्य है, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय कर लिया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भक्ति की महिमा इतनी प्रबल है कि वह पापी को भी तत्काल पवित्र कर देती है। ऐसा व्यक्ति साधु के समान पूज्य है क्योंकि उसका संकल्प भगवान की ओर है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय (भगवत्प्राप्ति का दृढ़ संकल्प) कर लिया है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति सबसे बड़ी शुद्धिकर्ता है। पतित से पतित व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से भगवान को पकड़ ले, तो उसका उद्धार निश्चित है।