मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति | कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || ३१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदक्षिप्रम्
शीघ्र
भवति
हो जाता है
धर्म-आत्मा
धर्मात्मा
शश्वत्-शान्तिम्
शाश्वत शान्ति
निगच्छति
प्राप्त होता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
प्रतिजानीहि
निश्चयपूर्वक कहो
न
नहीं
मे
मेरा
भक्तः
भक्त
प्रणश्यति
नष्ट होता (विनाश को प्राप्त नहीं होता)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! तू निश्चयपूर्वक कह दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भक्त का पतन नहीं होता। वह शीघ्र ही सद्गुणों से युक्त होकर परम शान्ति पाता है। भगवान स्वयं इसकी प्रतिज्ञा करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! तू निश्चयपूर्वक कह सकता है कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति मार्ग में एक बार चलने वाला साधक कभी व्यर्थ नहीं जाता। चाहे वह कितना भी गिरा हो, भगवान उसे सँभाल लेते हैं और उसे परम गति प्रदान करते हैं।