मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः | स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || ३२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदमाम्
मेरी
हि
निश्चय ही
पार्थ
हे पार्थ
व्यपाश्रित्य
आश्रय लेकर
ये
जो
अपि
भी
स्युः
हैं
पाप-योनयः
पाप-योनि में उत्पन्न
स्त्रियः
स्त्रियाँ
वैश्याः
वैश्य
तथा
तथा
शूद्राः
शूद्र
ते
वे
अपि
भी
यान्ति
प्राप्त होते हैं
पराम्
परम
गतिम्
गति को।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! मेरा आश्रय लेकर जो पापयोनि में उत्पन्न (हुए) हैं – स्त्री, वैश्य और शूद्र – वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ भगवान भक्ति के सार्वभौमिक स्वरूप को दर्शाते हैं। भक्ति के लिए न जाति, न लिंग, न वर्ण बाधक है। सभी को अधिकार है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! मेरा आश्रय लेकर, जो पाप-योनि में जन्मे लोग हैं – स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र – वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति के मार्ग में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। स्त्री-पुरुष, ऊँच-नीच, सभी भगवान की शरण में जाकर मुक्ति पा सकते हैं।